Friday, August 4, 2017

वो

उसके रहने से, घर मे खुशी रहती है,
वो नही होती तो घर मे वीरानी आ जाती है।

उसके होने का अहसास ही बहुत है मेरे लिए,
न होने के बारे में मैं सोच भी नही सकता।

आफिस में रहूँ, या कही सफर में रहूँ,
वो हर वक़्त मेरे साथ होती है।

हर वक़्त, हर पल उसकी मुस्कान साथ होती है,
वो नही होती, तो भी वो मेरे साथ होती है।

वो जो मेरी हमसफ़र है, कह नही पाता,
उससे कुछ भी, क्यों कि वो तो मैं ही हूँ।

वो जो मेरा आधा हिस्सा है, उसमे भी मैं ही हूँ,
अपेक्षा करता हूँ, वो सब जान जाएगी खुद से ही।

बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताये, उसको,
एक दिन मुझको, पहचान जाएगी खुद से ही।

जितेन्द्र

मैं

बंज़र नही हूँ मैं
मुझमे बहुत सी नमी है,
दर्द बयां नही करता,
बस इतनी सी कमी है।

Saturday, July 29, 2017

मैं और बाघ

जहा मैं रहता हूं,
पास ही में जंगल है,
वहां आज भी बाघ रहते है,
वहां आज भी तेंदुए रहते है।
कभी कभी लगता है,
की छत पर बाघ आ जायेगा,
पहले मैं डरूंगा,
फिर वो मुझे खा जाएगा।
पर शायद ये मेरे मन का वहम है,
बाघ उतना खतरनाक नही,
जितना मैं स्वयं हुँ,
अपनी पत्नी के लिए।
वो कहती है, मुझसे,
"बाघ से डर नही लगता जी,
आप से लगता है!"
मैने पूछा क्यों?
"बाघ तो एक ही बार मे मार खायेगा,
पर आप तो मुझे हर रोज़,
तिनका तिनका मारते है,
तड़पाते है, रुलाते है।" उसने कहा!
जितेंद्र

Friday, July 28, 2017

असमंजस

कुछ ख्वाहिशें,
जो पूरी होने को है,
कुछ ख्वाहिशें,
जो पूरी करने को है।

कुछ काम,
जो आज ही करने है,
कुछ काम,
जो आगे करने को है।

कुछ सपने,
जो पूरे हो चुके है,
कुछ सपने,
जो पूरे करने को है।

अतीत, भविष्य,
और वर्तमान,
में उलझी
मेरी जान।

आज की उलझन,
आज की भागदौड़,
कल क्या है करना,
नही है कोई सोच।

सोचता हूं, आज करूँगा!
सोचता हूं, कल करूँगा!
और ये भी की, ये करूँगा!
और, वो करूँगा!

पर न आज आता है,
न कल आता है,
न ये करता हूँ,
न ही वो करता हूँ।

हर एक दिन आता है,
और गुज़र जाता है,
फिर अगला दिन आता है,
और वो भी गुज़र जाता है।

पर मैं उदासीन रहता हूं,
किसी से कुछ नही कहता हूं,
शायद उदास रहता हूं?
या नही भी रहता हूँ?

शायद मैं खुद को नही पहचानता?
अपने से बात करता तो हूं रोज़,
पर अपने आप को ही नही जानता?
या जानना ही नही चाहता?

मुझे नही पता,
मुझे क्या करना है?
जिसने जो कहा,
क्या वो ही बनना है?

मैं निर्णय नही लेता,
असमंजस में रहता हूं,
शायद यही मैं हूँ,
शायद यही मेरी पहचान है।

शायद मुझे कुछ नही करना,
मुझे कुछ नही बनना,
शायद यही मेरी नियति है,
शायद यही मेरा भाग्य है।

जितेंद्र



Friday, July 7, 2017

मंज़िले और रास्ते

बस मंज़िल का पता रखते हैं,
रास्ते की फिक्र नही मुझको,
साधन कौन सा होगा, नही पता,
बस हौसले को जिंदा रखते हैं।

Saturday, July 1, 2017

जिंदगी

अपनी जिंदगी से मैं ऊब गया लगता हूँ,
ना जाने किस बात की कसक बाकी है,