Monday, December 31, 2012

Sunday, November 25, 2012

अजनबी वक़्त...

आज फिर, वक़्त खामोश सा लगता है,
अपने  में खोया परेशान सा लगता है,
मेरी तरफ  देखता है एक पल के लिए,
फिर नज़रे चुरा कर अजनबी सा बन जाता है।
 
जैसे की वो मुझे पहचानता ही नहीं,
मेरे बगल से ही गुज़र जाता है,
फिर घूमकर मेरे पास आता है, और- 
मुझसे मेरे ही घर का पता पूछता है?
 
में भी अनजान बन जाता हूँ, और-  
मुस्कराता हूँ; उसको कुछ नहीं बताता,
जब वो मुझसे अनजान बन सकता है,
तो अजनबी बन जाना खुद मेरा फ़र्ज़ बन जाता है।
 
हम दोनों को पता है की सालों से,
काफी वक़्त गुजारा है हमने एक साथ,
एक-दुसरे से वाकिफ है, हम अच्छी तरह, 
पर उन रिश्तों में अब कड़वाहट भर चुकी है।
 
इसलिए पिछली बातों को भूलकर,
हम बहुत आगे निकल आए है ,
एक नयी शुरुआत करने के लिए,
हम फिर अजनबी बन आए है।
जितेन्द्र गुप्ता 

Friday, September 21, 2012

धूप की एक किरण...

दीवार में लगे झरोखे से,
कमरे में धूप उतर आई.
चुपके से बिना कुछ कहे,
बिना मुझे कुछ बताये.

उस पीले रंग के धब्बे पर,
सहसा मेरी नज़र गयी.
मेरी आंखे रोशन कर के,
वो खुद भी चमकने लगी.

मैं उसको निहारता रहा,
परत दर परत.
आँखों में उसको भरता रहा,
काफी देर तलक.

कुछ देर पहले,
यह इस कोने में थी.
और अब चल कर 
उस कोने चली गयी.  

शाम होते-होते,
सूरज ढल जायेगा.
और कमरे में आई किरण का,
नामो-निशान भी मिट जायेगा.

और कमरा फिर से,
खाली हो जायेगा.
जैसे किरण कभी यहाँ-
आई ही नहीं थी.

क्या मैं किरण- 
की ही बात कर रहा हूँ?
या फिर ये मेरी जिंदगी है?
जिस पर पर मैं ये सवाल कर रहा हूँ?
जीतेन्द्र गुप्ता

Monday, September 17, 2012

एक शब्द: "प्यार"...

कुछ दिन के लिए बस,
मुझे प्यार हो गया था.
बातों-बातों में ही,
इकरार हो गया था.

पर यह इकतरफा प्यार,
ज्यादा दिन नहीं चला.
प्यार का भूत जब उतरा,
लगा मैं बीमार हो गया था.

शुरू में ही उसने मना किया था,
वो प्यार के अंजाम से डरती थी.
"इस प्यार का कुछ नहीं हो सकता!"
शायद वो बहुत सोचकर प्यार करती थी?

वो सही थी, पागल मैं ही था.
प्यार की हवाओं में बहता गया.
गर पहले सोच लेता तो मायूस न होता?
पर इतना सोच कर तो प्यार किया नहीं जाता?
 जीतेन्द्र गुप्ता

Sunday, September 16, 2012

तन्हा ख़ुशी..


हर रोज़, शाम को, जब मैं काम करके लौटता हूँ,
दिन भर की थकान के साथ, कमरे में अकेला होता हूँ.

दिन ढल रहा होता है और खिड़की से सड़क के उस पार-
खड़ा दिख रहा,अशोक का पेड़ भी शोक मना रहा होता है.

मेज पर ढेर सारी किताबें, इधर-उधर पड़े हुए बेतरतीब कपड़े,
कुछ और जरुरत के सामान, कमरे का एक श्रोत प्रकाशमान.

बस मैं होता हूँ और मेरा कल्पना लोक होता है.
मन जो सृजित करता है, कोरे कागज़ पर साकार होता है.

मैं शब्दों से खेलता हूँ, ख़ामोशी से बाते करता हूँ,
सन्नाटे को सुनाता हुआ, कविता बनाता हूँ

नहीं! मैं कवि नहीं हूँ, मेरी कविता में कोई रस नहीं होता,
मैं लेखक भी नहीं हूँ, मेरे पास लिखने को कुछ नहीं होता.

मैं आजाद होता हूँ, अपने ख्यालों की दुनिया में,
अपने तनहा बंद कमरे में, मैं बहुत खुश होता हूँ.

जीतेन्द्र गुप्ता 

Sunday, September 9, 2012

तेरी जुस्तजू ...


जिंदगी के कुछ पल, जाने कहाँ खो गए,
आँखे खुली हुयी थी, और हम सो गए.

हमको नहीं किसी से, कुछ भी गिला-शिकवा,
हम तो सदा ऐसे ही थे, ऐसे ही रह गए.

ना सोचा क्या है करना, क्या है बनना बड़े होकर,
अभी तो हम नादान थे, कब इंसान बन गए?

बिन मांगे ही मुझको, दे दिया यूँ प्यार इतना सारा,
ना पूछा की क्यों वो इतना, मेहरबान हो गए?

दस दिन की जिंदगी थी, दो दिन  यूँ  जी लिया,
की बाकी बचे हुए दिन, बेकार हो गए.

जो जीती हमने बाज़ी, तो प्यार था सनम,
जो हार गए तुझको, बदनाम हो गए.

वो वक़्त की थी बाज़ी, या प्यार का इक नगमा?
जिए, जिसको गाकर, हम आबाद हो गए.

"जीतेन्द्र गुप्ता"

Friday, September 7, 2012

कसक..


"कुछ कसक थी शायद,
मन में दबी हुयी,
सिसकियाँ तो आई,
पर किसी ने ना सुनी.

कुछ देर तलक शायद ,
मैं देखता रहा उसको,
फिर मैं भूल गया उसको,
वो भूल गयी मुझको."

"जीतेन्द्र गुप्ता "

आबो-हवा..



सुबह से ही बादल छाए है,
पर बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरी.
हवा रात से ही बहुत तेज बह रही है,
पर यह आंधी और तूफान तो नहीं.

यह निश्चित नहीं की बारिश होगी ही,
प्यासी धरती प्यासी ही क्यों न रहे?
और इन हवाओं में भी शायद अब आंधी-
या तूफान बनाने की हिम्मत नहीं बची.

सब कुछ अनियमित सा हो गया है,
गर्मियां लम्बी खीचने लगी है.
सर्दियाँ, खुद ठण्ड से, सिकुड़ने लगी है.
और बारिश का तो कहना ही क्या?

क्या इन हवाओं में भी मिलावट हो गयी है?
या बरखा भी अब अशुद्ध हो गयी है?
सदियों से मानव की संगति में रहकर-
यह पृथ्वी भी जैसे भ्रष्ट हो गयी है.
"जीतेन्द्र गुप्ता "

Wednesday, September 5, 2012

एक ख्वाब..



कल रात अचानक नींद टूट गयी;
घडी देखा तो लगभग एक बज रहे थे;
कुछ देर तक लेटा रहा यूँ हीसोचा-
नींद फिर से आयेगीपर ऐसा नहीं हुआ.

अनंत आकाश मेरे सामने था;
और चाँद पूरे शबाब पर था.
थोड़े बहुत बादल भी छाए थे,
और ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी.

मैंने अपना बिस्तर छोड़ दिया,
और चल कर बालकनी तक पहुंचा.
देखा- दिन में भीड़ से भरी रहने वाली;
घर के सामने की सड़करात में वीरान पड़ी थी,

सन्नाटा इस कदर घुल गया था जैसे,
इस दुनिया में अब कोई न बचा हो.
बस एक मैं थामुझसे कोई न छिपा हो,
और मुझे अपने वजूद का एहसास हो रहा था.

मैं काफी देर वही पर खड़ा रहा,
सोये हुए सन्नाटे  में खोया  रहा.
नींद मुझसे कोसों दूर थी,
पर रात तो अभी शुरू ही हुयी थी.

अनमने-पन से मैं बिस्तर को लौटा,तो देखा-
तुम्हारी यादों की गठरी मेरे सिरहाने  पड़ी थी.
और कोई अनजानी सी चीज थी, 
जो टूटकर पूरे बिस्तर पर बिखर गयी थी.

'ख्वाब ही रहा होगा, शायद', मैंने सोचा,
अँधेरे में उसके कुछ टुकडे चमक रहे थे.
मैंने खुद को जगाया, और उन टुकड़ों को,
समेट कर दुबारा जोड़ने की कोशिश की.

जब ख्वाब के  कुछ टुकडे जुड़ गए आपस में,
और तस्वीर का एक पहलु कुछ साफ़ हुआ, 
तो देखा-एक तो "तुम" ही थे उस ख्वाब में मेरे,
पर मेरी ही उस चीज में 'मैं नहीं था'.
"जीतेन्द्र गुप्ता"

Sunday, September 2, 2012

सच्चा हमसफ़र..


गर्मियों का सूरज, सिर पर चढ़ आता है,
वक़्त कटता नहीं, दिन चढ़ जाता है,
भीषड़ गर्मी और उमस झेली नहीं जाती,
दिन गुजरता है घर में, बाहर निकला नहीं जाता है.

पर वही सूरज शाम तक ढल जाता है,
लालिमा छोड़ क्षितिज पर, अस्त हो जाता है,  
सूरज के साथ ही शाम भी ढल जाती है,
और उजले आकाश का मुंह काला कर जाती है.

मुंह पर लगी कालिख को धोने की प्रत्याशा,
आकाश के चेहरे पर रात में छलक आती है,
रात में सूरज भले ही उसका साथ छोड़ दे,
पर बुरे वक़्त में चन्द्रमा की ही बारी आती है.

कितनी अजीब बात होती है कि चन्द्रमा,
जो खुद सूरज की ही रोशनी से चमकता है,
गर्मी उसकी सोख कर, हमें श्वेत शीतलता देता है,
स्याह अँधेरी रातों का सच्चा हमसफ़र बनता है.
"जीतेन्द्र गुप्ता "

Saturday, August 25, 2012

तुम और मेरी कविता...

हाथ में कलम लेता हूँ,
और कोरा कागज-
सामने रख कर,
न जाने क्या सोचने लगता हूँ?

जब मैं लिखना चाहता हूँ-
तब भाव नहीं पनपते.
और जब भाव उमड़ते हैं,
तो वक़्त ही नहीं मिलता.

जब वक़्त मिलता है-
तब शब्द नहीं मिलते.
और जब सब-कुछ होता है,
तो कलम ही कही खो जाती है.

सोचता हूँ, कुछ तुम्हारे बारे में लिखूं,
उन हसीं लम्हों को फिर से जिन्दा करूँ.
जिनकी कब्र, मैं दिल के-
किसी कोने में बना आया हूँ.

पहले, जब तुम सामने होते थे,
मेरे होश गुम हो जाते थे.
कहीं उन लम्हों को फिर से जिन्दा करके,
मैं अपनी कविता के शब्दों को न खो दूँ?

या तो तुम्हे ही पा लूँ,
या कविता ही बना लूँ.
कुछ पाने के लिए कुछ खो दूँ?
या तुम्हारा नाम ही मैं कविता रख दूँ?
जीतेन्द्र गुप्ता 

Wednesday, August 15, 2012

A Dream to be a Storyteller..


It is my dream to be a published author. I often dreamed that I am holding a novel written by me and the title of the novel is "Love is nine days wonder". Although I have written many short stories, but the short story which I have written on my real love, is really close to my heart. As I was an introvert in nature during my graduation college days, and I didn't like to share my feelings with my colleagues. I was having a habit to write my diary regularly in those days. The story is really based on my real love in my graduation days, and I have taken help from my diary as well.
The thing that inspires me to write my love story was the fact that I had promised my beloved that "One day I will be a writer." In addition to this, writing is my passion and when ever I am feeling free, I grab my diary, picked a pen and synthesize a number of words on the blank white pages. Although I have published a number of scientific research article, as I am a research scholar by my profession, but I would like to be called as a storyteller like Ruskin Bond.
The experience of this story, which I have written, was very much painful for me, because I have to recall all those incidences which was happened in those days and I longed to forget all those incidences long before, but this story is meant everything to me as well as to my life.    

Monday, August 13, 2012

Life in Jaunpur city

Riverside view from "Sadbhavna" bridge on Gomati river

"Royal" bridge view from Sadbhavana bridge

Balcony of my room

Horizon from the roof of my home

Cloudy Sky

The sky

River "Gomati"

"Sadbhavna" bridge and Mandir

Monday, August 6, 2012

Medieval Jaunpur

I was searching for the images of the ancient Jaunpur, and I have found some interesting images of the city. It is interesting to know that the city, I am living presently, was looked like that. These are very rare images, drawn in the time of British rule by some brilliant artist, Thomas and William Daniell. Just have a look at these images..

This image is the "Plate 9 from the third set of Thomas and William Daniell's 'Oriental Scenery.' by Daniell, Thomas (1749-1840). It is the picture of Jama Masjid, Jaunpur.

This image is of "The Bridge At Juonpore, Bengal; by Thomas Daniell, 1804* (BL)" In this picture you can see the Shahi Bridge and Shahi Fort. Although I am a little bit confused by the term "Bengal". May be at that time, the city was under control of Bengal province.


This is the "Akbar's bridge over the Gumti River at Jaunpur; a watercolor, c.1790-1800* (BL)". Today it is called Shahi Bridge. 


This picture is showing the "View of the River Gomti near Jaunpur (U.P.). 1 December 1789, by Daniell, Thomas (1749-1840)"

This is the "Scene in the town, Jaunpur (U.P.). 7 December 1789, by Daniell, Thomas (1749-1840), and Daniell, William (1769-1837)". I don't know, where this place is situated now in modern Jaunpur. But it is very interesting image of the city.

 Image Courtesy: The British Library

Tuesday, July 31, 2012

Just look at the comments on my published poem..

Just look at the comments which I have got with in last two days on my facebook profile, since I have posted the picture of poem, which have been got published in Daink Jagran news paper. I am feeling like any celebrity.....
Approximately 28 peoples, including those who are not even familiar with me, have liked it. I am thankful to all those persons, specially Ashutosh Singh Vats, who always encourage me to do great things in life. Just look at his comments, he has posted a beautiful poem dedicated to me, in the comment bar....



Sunday, July 22, 2012

"इच्छाओं की चिता"

शाम को सूरज अस्त होने से पहले,
कुछ ज्यादा तेज चमकाने लगता है.
और दिए की लौ बुझने से पहले,
कुछ ज्यादा ही फड़फड़ाने लगती है.

तुफान आने से पहले सन्नाटा पसर जाता है,
और  कुछ देर के लिए ही यह वक़्त ठहर जाता है.
फिर सूरज अस्त हो जाता है, दिया बुझ जाता है,    
और तुफान भी विनाश लीला दिखा कर चला जाता है.

तो अपनी जिंदगी को मैं क्या समझूं,
बुझते हुए दिए की लौ का फड़फडाना, 
तुफान के पहले सन्नाटे का पसर जाना,
या शाम के आकाश में सूरज का अस्त हो जाना.

मेरी कविता भी शायद मेरी सोच की ही एक मिसाल है,
कम शब्दों में लिखी गयी जिंदगी की एक किताब है.
गर बारिश हो जाती तो मुझको सुकून मिल जाता,
पर आँखे मेरी सुखी है और दिल में नैनीताल है.

बचपन से ही जो सपने आँखों में बस गए थे,
उसे दिल के किसी कोने में बहुत गहरे  गाड़ आया हूँ,
गलती से भी कोई वहां ना पहुँच जाए,
इसलिए पूरी तरह से उसको श्मशान बना आया हूँ.

इच्छाओं की चिता से निकली हुयी राख का मैं ढेरी,
या किसी निर्जन देश की सीमाओं का हूँ प्रहरी.
बड़े सपने देखकर छोटो में ही खुश होने लगा हूँ,
जी रहा मैं या मर गया हूँ, दुविधाग्रस्त हो गया हूँ.

जीतेन्द्र गुप्ता 

Saturday, July 7, 2012

A letter to God..

Dear God;
I had a dream, when I had passed my intermediate examinations in 2003. But due to certain inappropriate decisions, I found myself going very far from the dream, I had. When I realized that I have gone a long way on a wrong path, and now, I could not return to the beginning, I started blaming myself for my failure. A feeling of guilt have choked my heart, and I started to ruin my time. 
The dream was related to become a scientist. Now, there is a opportunity in front of me, once again in my life.  And I am in the position to fulfill my dreams. I have good academic record, qualified GATE exam, published a number of scientific papers in various impact factor journals. What more in addition to this, anybody can wish from You to have in life? Yes, there is a lack of one thing, the so called fellowship. It is the one thing I don't have, and it's the only drawback in my resume.


On the 10th of july 2012, there will be  an interview in BHU, Varanasi for Ph.D. admissions. I have applied in that interview. Now I will have to face it.....
From this blog post, I am praying from You for my dream come true. As the science have also accepted Your existence (in a experiment in Geneva about the "God Particle") I am sure that You are really there and You are reading my blog. (as nobody else is interested in my life as well as in my blog).

So what do you think God; "Will my dream come true???"    
Kindly respond to this post please.......................I am waiting for your answer...

Friday, June 22, 2012

मेरी दुनिया;;

"जौनपुर का क्षितिज"
 नीलांचल, दूर क्षितिज ,
शीतल हवा और प्रकृति,
मीलों फैली हरियाली,
और उसमे उसकी अनुकृति.

कलरव कूजित पक्षी,
शांत अथाह समुन्दर, 
झील सी गहरी आँखे,
जिसमे डूबा मेरा मन.

निशा; तुम्हारे केश,
यह रूप-रंग, यह भेष,
कुछ तो है इनमे विशेष,
मैं खोया; नहीं कही कुछ शेष.

क्षितिज पे छाई लालिमा और,
तुम्हारे हांथों की मेहंदी,
बस एक तुम्हारी मुस्कान,
मेरी पुरे दिन की थकान .

जा रहा है पक्षी समूह,
और खो रहा उजियारा,
खो रहा है यह तेज,
और छा रहा अँधियारा.

जाते हुए से पल,
कितने सुन्दर लगते है.
खोये-खोये से हम,
कितने प्यारे  लगते है.

थक गया सा हूँ,
खुद में ही खो गया सा हूँ,
दुनिया की इस भीड़ में,
तनहा सा हो गया हूँ.

बेमतलब है यह प्रेमदिवस,
बेकार सी है यह दुनिया,
बोझिल सी थकी हुयी संध्या,
बोझिल ही मेरी दुनिया.


 जीतेन्द्र  गुप्ता 

Wednesday, June 20, 2012

nobody wants to talk to me;;

Yes; it's true. Nobody wants to talk to me. What happens to me? I could not figure it out. Is there something wrong with me or something wrong with anybody else????

Sunday, June 3, 2012

PG days;;

a glimse of post graduate days of my life;; you can see Narendra, Me, Vineet, Rishabh, Satyam and Daisy;;


Sunday, May 20, 2012

Missing graduation days...

Today, I was badly missing my graduation days, when I was a student in college. I was also the topper of my batch in my college. The photo I am pasting below, are the memories of those old days. You can see our  Principal sir in the first photograph, sitting on the chair. In the second photograph, Vijay and company is present. Apart from them Nandlal, Santosh, Arjun, Kamlesh, Santwana, Navneet and Ashish sir is also present in various photographs.
Really, those were the golden days of my life.......missing my graduation badly......