Sunday, January 7, 2018

कशमकश (भाग 2)

सवाल कई है, जो उमड़ घुमड़ कर मेरे चिन्तनलोक में मंडरा रहा है। पर सबसे ज्यादा वो एक प्रश्न, जिसपे मैं विचारोत्तेजित हूँ, वो ये है कि, मैं क्या करूँ? मैं क्या कर सकता हूँ? क्या मैं कुछ कर पाऊंगा? कहानी कुछ इस तरह से है कि पिता जी ने कॉलेज खोलने के लिए जिस ट्रस्ट का पंजीकरण करवाया था, उसपर आयकर की नोटिस आयी। जवाब देने के लिए जब पिता जी लखनऊ गए, तो अधिकारी ने उनसे डेढ़ लाख की मांग की। पिता जी पचास हजार देने को तैयार थे, पर वो नही माना, उन्हें ट्रस्ट का पंजीकरण निरस्त कर दिया। अब मामला अधिकरण में गया है। मुझे दुराशा ही नही नही अपितु पूरा यकीन है कि अधिकरण में दो या तीन लाख से नीचे की मांग तो नही ही होगी। उस अधिकारी के पास पिताजी केवल चार्टर्ड अकाउंटेंट के साथ ही नही गए थे, बल्कि कई उसी पद पर रह चुके भूतपूर्व अधिकारियों का रिफरेन्स ले के गए थे। लेकिन उसे पैसे चाहिए थे तो बस चाहिए थे। उसने अपने पद की शक्ति का भरपूर प्रयोग किया और अब ज्यादा दिए बिना बात ही नही बनेगी। कहानी अभी जारी रहेगी, लेकिन यक्ष प्रश्न वही रहेगा, मैं क्या करूँ? मैं क्या कर सकता हूँ? क्या मैं कुछ कर पाऊंगा?
अपने कार्यालय में
अभी पिछले हफ्ते मैने एक फ़िल्म देखी थी। मैट्रिक्स!

Saturday, December 16, 2017

इन दिनों...

हम शायद इस दुनिया मे कुछ कड़वे अनुभव लेने के लिए ही आते है। कौन जानता है कि ये दुनिया सत्य है या मिथ्या है? लगता है जैसे जब मौत होगी तो नींद से उठूंगा, और इस दुनिया के मिथ्या रूप का भान होगा। लगता है जैसे ये दुनिया एक सपना है, मौत के बाद ही नींद खुलेगी। गीता के अनुसार हम खाली हाथ आये है, खाली हाथ जाएंगे।

ताल्लुक कौन रखता है किसी नाकाम से लेकिन,
मिले जो कामयाबी सारे रिश्ते बोल पड़ते है,
मेरी खूबी पे रहते है यहाँ अहले जबाँ खामोश,
मेरे ऐबों पे चर्चा हो तो गूंगे बोल पड़ते है।

यूँ तो मुझमे कोई ऐब नही,
बैठ जाता हूँ मिट्टी पे अक्सर,
क्यों कि मुझे मेरी औकात अच्छी लगती है।

सुबह की सैर.....
आजकल बनकटी, पीलीभीत के मार्ग पे सुबह की सैर को जा रहा हूँ। हालांकि ये वही मार्ग है, जिसपे बाघ अक्सर जंगल से निकल आता है, और लोगो पे हमला कर देता है। पर आजतक मेरी बाघ से मुलाकात नही हुई। सुबह जाते वक्त कुछ डर तो लगता है, लेकिन बाघ दिखने की जिज्ञासा भी रहती है। लगता है जिस दिन बाघ से मुलाक़ात होगी, या तो बाघ रहेगा या मैं....

Tuesday, December 12, 2017

कशमकश.....

"हम समझ गए, आपका मन नही है इसलिए हम फ़ोन रखते है", उन्होंने कहा और फ़ोन काट दिया। और मैं जैसे बीच मझधार डूबता उतराता रहा। खुद को ये समझाता रहा, की जब उनके हिसाब से मेरा वो बाते करने का मन होगा, तो ही वो बाते करेगी, नही तो यही कहेंगी, "हम समझ गए, आपका मन नही है, इसलिए हम फ़ोन रखते है"। शायद उन्हें सिर्फ अपने मन का ख्याल आता है, मेरे मन का नही। उन्हें लगता है कि मैं ही उन्हें उत्पीड़ित करने वाला इंसान हूँ, और वो ही केवल रोना जानती है। जब कि सच्चाई ये है कि रोता मैं भी हूँ, बस आंसू नही निकलते। उत्पीड़ित मैं भी होता हूँ, बस आह नही निकलती।
उनका कहना था कि मुझे पढ़ना चाहिए, तैयारी करनी चाहिए। उन सब को मुझसे बहुत उम्मीदें है कि मैं DM या SDM बनूँगा, और फिर हमारे पास रुपया, पैसा, धन, दौलत, गाड़ी, बंगला, इज़्ज़त, शोहरत, नाम और सम्मान सब कुछ होगा। उनकी मुझसे जो उम्मीदे है उसको मैं नाउम्मीद में कैसे तब्दील कर सकता हूँ? बहुत मुश्किल है, और बहुत कष्टदायी भी। वो किसी ऐसे परिचित का उदाहरण दे रहीं थी जो BSA है। बता रहीं थी कि उस BSA ने इतनी दौलत बना ली है कि उसके पास पैसे रखने की जगह नही है। इतनी अकूत दौलत इकट्ठा हो गयी है कि पूरा का पूरा गांव ही उसके पैसे से शराबी बन गया है। उसकी बातें सुनकर मुझमे सो रही पैसे बनाने की क्षुधा फिर से जागृत होने लगी। और शायद अप्रत्यक्ष रूप से वो मुझे भी प्रोत्साहित कर रही थी कि मैं भी उसी BSA जैसा बनू। पर मेरी समझ मे नही आता कि पहले मैं पढू, लिखू, और सरकारी सेवा में जाऊ, तब लूट खसोट कर के दो नंबर का पीटू। इससे अच्छा है कि मैं केवल अर्थसाधना में ही न लग जाऊ? आखिर अंतिम उद्देश्य पैसा ही कमाना है तो पढ़ने की क्या आवश्यकता है? क्यों मैं लक्ष्मी को साधने के लिए सरस्वती को साधन बनाऊ?
इन दिनों अजीब सी कशमकश से गुजर रहा हूँ। सच मे अजीब सी कशमकश से। मुझमे भी दो नंबर का पीटने का शुरूर छा रहा है। पर उसमे नैतिकता आड़े आ रही है। वैसे तो इन दिनों ज्यादा कुछ दो नंबर का मिलता नही,लेकिन जब मिलता है तब नैतिकतावश खुद पे शर्म आती है। जमीर गवाही नही देता की इस तरह मैं वो इकट्ठा करू। पर नैतिकता को एक किनारे रख के मैं पीट ही देता हूँ। लेने के कुछ समय तक मुझे खुद पे शर्म आती है। फिर अच्छा लगने लगता है। पीटने के बाद अच्छी फीलिंग आती है। पर साथ ही एक कसक रह जाती है कि मेरे ही पद पे अन्य जगहों पे रहने वाले लोग मुझसे ज्यादा पीट रहे होंगे। मैं उतना नही कर पा रहा हूँ। और मुझमे और ज्यादा पीटने की भूख लग जाती है। ये सिलसिला चलता रहता है। थमता नही। और मैं इसी कशमकश में डूबता उतराता हूँ। जब कुछ नही मिलता तो खराब लगता है, जब कुछ मिलता है तो भी शर्म आती है, हालांकि मिल जाने के कुछ देर बाद अच्छा लगने लगता है, किन्तु ये खुशी मेरी भूख को बढ़ा देती है। और मुझे फिर से खराब लगने लगता है। कशमकश का ये सिलसिला चलता रहता है, और मैं इसी में डूबता उतराता रहता हूँ। मेरी समझ मे नही आता कि मेरी भूख क्यों बढ़ रही है? मेरे खर्चे तो सीमित है, कोई महंगा शौक भी नही है। तो इतनी भूख क्यों?
आज तक जितना भी मैंने इस जगह पे पीट कर बनाया होगा, सब मैंने घर पे दादी अम्मा को समर्पित कर दिया है। उस राशि से बहुत कम का इस्तेमाल ही मैंने शायद किया होगा। शायद मैं ऐसा इसलिए करता हूँ ताकि घर वालो को ये लगे कि कल तक जो पैसे वो दिया करते थे, अब उनकी लेने की बारी आई है। पर ये अर्धसत्य ही है।
अभी मेरे पिताजी को ही मेरे ही विभाग के एक अधिकारी को एक मोटी सी राशि बतौर सुविधाशुल्क देनी पड़ी ताकि काम हो जाये। उमे मेरी भी पहचान काम नही आई। जब पिता जी ने मुझे इस बारे में बताया तो मेरा मन घृणा, क्षोभ, क्रोध और शर्म से भर गया। मेरा विश्वास इंसानियत से उठ गया। ये कैसा समाज है जिसका हम हिस्सा है? यहाँ करदाता भी भ्रष्ट, कर अधिकारी भी भ्रष्ट और कर वसूलने वाली सरकारे भी भ्रष्ट। जब सब अपनी अपनी जेबे भरने में लगे हुए है तो जरूरत क्या है इस भ्रष्ट तंत्र की। क्या जरूरत है ऐसे कानून की, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता हो?
इस भ्रष्टतंत्र में आकर मैं भी दोगला हो गया हूं। लेते वक्त मुझे जो भ्रष्टाचार नही दिखता, देते वक्त वो बहुत चुभता है। खलता है। धीरे धीरे मेरा विश्वाश भी इंसानियत से उठ रहा है। अब मुझे सब कुछ पैसा ही दिख रहा है। भले ही मेरी जरूरते सीमित हो, भले ही मुझे कोई महंगा शौक न हो पर सब कुछ शायद पैसा ही है।
मुझे माफ़ कर देना की मैं तुम सब की उम्मीदों को नाउम्मीदी में बदल रहा हूँ। जब तुम्हारी और सब की नज़रों में सब कुछ पैसा ही है तो मैं पैसा ही बनाने पे ध्यान केंद्रित करता हूँ। सरस्वती मेरे लिए मायने नही रखती जब लक्ष्मी जी मेरा लक्ष्य है।
जितेंद्र

Thursday, November 30, 2017

उनकी कलम से.....

MOTHER

Mother,Oh Mother!!
You are so dear,
Whenever I sad,
You bring cheer,
         
     Whenever I get hurt,
     Your eyes full of tears,
     You are like the light,
     That make my day bright,

Whatever is in my mind,
You are quick to find,
Whenever I am in confusion,
You bring me proper conclusion,

        You are my God,
        You are my heart,
        Whenever I need you,
        You are so near,
        Mother, Oh Mother.

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ऐ हवा तू बता तेरी रजा क्या है
तुम इतना मचलती क्यों हो
तुम इतना इठलाती क्यों हो

मुझे पता है कि ....

तुम मन  की  मौजी  हो
कहीं भी चली जाती हो
और छटा से मन मुग्ध
खुशबुओं को लाती हो
और मन को पुलकित
कर जाती हो

इसलिए प्रफुल्लित मन
को देखकर तुम इतना
इतराती और इठलाती हो

क्या तुम मेरा भी एक काम करोगी
मेरे  महबूब के पास जाओगी
और मेरे प्यार की खुशबुओं
को उन तक पहुँचाओगी??

उनसे कहना कि.....

तुम यहाँ खामोशी से
बातें करते हो
तुमसे दूर बैठी कोई
तुम्हारी तस्वीरों से
बातें करती है!!

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नए नए सपने संजोंने लगी थी
आँखें............
नए नए एहसासों से मँहकने लगा था
मन............

नए नए रंगो में घुलने लगी थी
जिन्दगी..........
उनकी प्यार भरी बातों से मिलने लगी थी खुशी...............                               

मुझे लगा मेरी हर अदा उनकी रजा
को रास आया..........
जिसे मैने बड़ी सिद्दत से शबनम की
तरह सजाया ........

तब मुझमें गुरूर आया कि उन
पर मेरे प्यार का शुरूर तो
छाया.........
                   
लेकिन चन्द लम्हों की दूरी ने
एहसास दिलाया..........
वो दो पल का शुरूर था बस
तेरा झूठा गुरूर था.......

इस प्यार भरी बरसात में
तुम कल भी प्यासी थी.......
और आज भी प्यासी रह
गयी............

जिसे तुम अपना प्यार समझ
बैठी.........
वो तुम्हारा एक भ्रम था जो
तुम्हारे दिल में समाया था.......

वो तो समय का तकाजा था
प्यार का मौसम आया  था बस
प्यार के  नगमें को गुनगुनाया
था........

बस तुम तो सपनों में चूर
थी.........
जबकी प्यार की खुशबुएँ
तुमसे कोसो दूर थी!!........
       P........✍

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कसूर क्या है मेरा,किस बात
के लिए मैं हूँ जिम्मेदार??

सादगी है मेरी सजा,क्या इसके
लिए मैं हूँ जिम्मेदार?

मैने तो सोचा कि सादगी का भी
है अपना एक मजा,

मगर मेरी सादगी ही बन गयी
मेरी ही एक सजा!!

मैने एक दिन उनसे पूछा कि
क्या आप मुझसे करते हैं  प्यार?

उन्होने कहा कि मैं
क्यो करू तुमसे प्यार
तुममे ऐसी क्या है बात?
तुममे ऐसी क्या है क्वॉलिटी
जिससे मैं करू तुमसे प्यार?

परिंदो की तरह भटक रहे हैं
इधर उधर.......
एक मौके की तलाश में

कि एक दिन वो आएँ और कहें कि
जानेमन.....
हमें प्यार है तुमसे और तुम्हारी
सादगी से!!!

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ऐ  घटा  तू  यहीं  क्यों  गरजती  हो......       
मेरे महबूब के यहाँ क्यों नही बरसती हो....
मेरे  दिल पर ही क्यों बिजलियाँ गिराती हो.........
उनके दिल पर भी मेरे प्यार की बिजलियाँ गिराओ तो......

मेरी यादों को उन तक पहुँचाओ तो........
जरा मेरे महबूब के यहाँ भी बरस आओ तो........
माना जब तुम बरसती हो तो चारों तरफ खुशियाँ छा जाती हैं.......

खेतों में हरियाली आ जाती है..........
फिज़ाओं में रंग बिरंगे फूल खिल जाते हैं.....
जीव जन्तु सब प्रमुदित  हो जाते हैं....

आसमान में पंक्षियाँ  घूम घूम कर गानें लगती हैं......
बागों में मोर झूम झूम कर नाचने लगता है........
तरूगन  भी अपनी मस्ती में झूमने लगता है..........

लेकिन जब तुम गरजती हो तो मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती है.........
मेरी साँसें तेज हो जाती हैं...........
और जब तुम बरसती हो  तो भूली
बिसरी सारी यादें जाग जाती हैं.........

उनके दीदार को आँखें बेकरार हो जाती हैं...........
और ये  आँखें भी तुम्हारे साथ बरस जाती हैं.........
इसीलिए ऐ घटा तुम सिर्फ यहीं मत गरजों.............
जरा मेरे महबूब के यहाँ भी बरसों.......

अरे जो पत्थर दिल लेके बैठे हैं......
उनके दिल पर मेरे  प्यार की मीठी
मीठी बूँदें तो बरसाओं..........

उनके दिल पर मेरे प्यार की ठंडी
ठंडी बरसातें करके उनके दिल को
तो पिघलाओ..........

प्यार की भीनी भीनी सौंधी सौंधी
बौछारें तो लाओ..........

उनके तन को तो मँहकाओ........

मेरे प्यार के एहसासों को एक बार
फिर से उनके मन में तो जगाओ......
                
जरा मेरे महबूब के यहाँ भी
बरस आओ.......

पूनम की कलम से साभार.............

Tuesday, November 28, 2017

पहली सालगिरह....

प्यारी पू-र्णि-माँ,
पिछले साल के दिसंबर से इस साल के दिसंबर के बीच हमने एक साल का सफर साथ में तय कर लिया है। इस बीच हमारे तुम्हारे रिश्ते के बीच कई उतार चढ़ाव आये पर तुम्हारे साथ रहना मुझे हमेशा बहुत अच्छा लगता रहा। तुम नही होती हो तो तुम्हारी कमी खलती है। ना जाने कैसे तुम मेरी जिंदगी में आई, चुपके से, और दिल की किसी कोने में अपनी जगह बना गयी।  मुझे पता ही नही चला, की कब मुझे तुम्हारी लत लग गयी, कब तुम मेरी जरूरत बन गयी, और कब तुम जरूरत से भी बढ़कर मेरी हमसफर बन गयी।
तुम्हे तो स्मरण ही है की दिसंबर की शुरुआत को हमारी शादी के 1 साल पूरे हो जाएंगे। सच्चे अर्थों में शायद मुझसे शादी करके तुमने मुझपे अहसान किया है। इस बात के लिए मैं तुम्हारा तहेदिल से शुक्रगुजार हूं। मुझे याद है, जब हमारी तुम्हारी पहली बार बात हुई थी, जब मैं तुम्हे देखने गया था, तुम्हारे घर। मैंने तुम्हें देखते ही पसंद कर लिया था। पर तुम्हारे व्यवहार से अनभिज्ञ होने के कारण कुछ सशंकित था। पर तुमसे बात करके मेरी उस शंका का भी निवारण हो गया। उस दिन तुम्हे देख के जब मैं घर लौटा, तो दादी ने मुझसे पूछा था, तुम्हारे बारे में मेरी क्या राय है। मैंने उन्हें बेहिचक बता दिया था की उम्मीद से बेहतर! उम्मीद से ज्यादा! दादी, पापा तो पहले से ही तुम्हारे पक्ष में थे। वो बस मेरी रजामंदी का इंतज़ार कर रहे थे।
मुझे ये भी बाते याद आती है जो कि तुम कभी कभी मुझे बताती थी अपने पिता जी के बारे में। कैसे उनके जाने के बाद तुम अकेली हो गयी थी, शायद अंदर से बहुत टूट चुकी थी। एकाकीपन, सूनापन, निराशा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने तुम्हे अंदर तक झकझोर दिया था। किस तरह कोई तुम्हारी जिंदगी में रोशनी की किरण बन के आया। मुझे याद है, आज भी याद है।
उस वक़्त तक मैने तुम्हे अपने बारे में हर एक बात भी बता दी थी, मेरे भूत से लेके भविष्य की हर एक बात मैने तुम्हे बताई थी, सिवाय एक बात के और वो ये की तुम खुद मेरी जिंदगी में एक रोशनी की किरण बन के आयी थी। तुम्हे मैने ये बात कभी नही बताई की मेरा शादी के बंधन से विश्वास ही उठ चुका था। मेरे आस पास उन दिनों शादी के ऐसे उदाहरण मौजूद थे, और आज भी है जिनके बारे में जानकर मेरा शादी के रिश्ते से विश्वास ही डगमगा गया था। उस वक़्त तुम्हारे साथ ने मुझमे आत्मविश्वास का संचार किया था। मैं मेरे पिताजी और दादी की जिद के आगे हार गया था। दादी ने तो घर ही छोड़ दिया था। उनका कहना था जब तक मैं तुमसे शादी करने के लिए हाँ नही बोल दूंगा, वो लौट कर घर ही नही आएंगी। आज तुम मेरे साथ हो तो मेरे पिता जी और मेरी दादी की बदौलत। वास्तव में मुझमे समझ की कमी थी। लोगो को पहचानने में अभी मैं कच्चा हूँ।
सच कहूं तो तुम्हे पा कर मैं बहुत खुश हूँ पर तुम्हे हर वक़्त, हर पल मैं ये बात तो नही बता सकता। इसलिए कभी कभी जब गुस्से में मैं तुम्हे कुछ कह देता हूँ, तुम्हे डाँट देता हूं, कही का गुस्सा तुम्हारे पे उड़ेल देता हूँ तो मुझे बहुत पश्चाताप होता है। नाहक ही मैंने तुम्हारा दिल दुखाया। मन अपराधबोध से भर जाता है कि मैंने तुम्हारी कोमल भावनाओ को ठेस पहुंचाई। और बाद में इसके लिए मैं तुमसे माफी भी मांगता हूं। तुम्हे याद होगा, कई बार मैने तुमसे एक ही बाते कही है कि मेरी बातों को हल्के में लिया करो। कई बार समझाया भी की मैं गुस्सा करूँगा ही...बस तुम नाराज़ मत हुआ करो, मैं गुस्सा करना नही छोड़ सकता.. सॉरी! ये आदत नही बदल पाऊंगा, आई मिस यू एंड आई लव यू टू...लेकिन मैं गुस्सा करूँगा! करूँगा! करुँगा! तुम अपने मे परिवर्तन लाओ। मुझसे उम्मीद न रखो। मैं खुद को नही बदल सकता। तुम खुद को बदलो।
तुम मेरी बात मानती तो हो, और कहती भी हो कि ठीक है! पर ठीक है कहने से काम नही चलेगा। कल तुम फिर वही गलती दुहराती हो। फिर आंसू बहाती हो, तनाव लेती हो। तुम्हे पता है कि आजकल तनाव ले कर सोचने की बीमारी बहुत लोगो को है। अब तुम भी इसी जमात में शामिल होने की चेष्टा कर रही हो। मैं नही चाहता कि तुम भी सोचने वाली बीमारी से ग्रसित हो जाओ।
एक बात और, जो कभी कभी मैं गुस्से में आकर तुमसे कह देता हूँ, की तुमने मुझे धोखा दिया। मुझे नही मालूम कि ये कितना सच है कितना झूठ। क्योंकि मैं सुबह से लेकर शाम तक ऐसी बहुत सी बातें कहता हूं जो कि झूठ होती है। या मुझे खुद नही पता होता कि जो कुछ भी मैं बोल रहा हूं वो सच ही है या झूठ। ये सच है कि मैंने हमेशा ये ये चाहा कि मेरा हमसफर कुछ रचनात्मक व्यक्तित्व का धनी हो। इसके पीछे निश्चितरूप से मेरा स्वार्थ ही है। किसी से उम्मीद करना कोई बुरी बात नही। मैंने भी तुमसे उम्मीद की। उम्मीद का पूरा हो जाना बहुत अच्छा होता है। लेकिन ये सच्चाई का केवल एक ही पहलू है क्यों कि उम्मीद का पूरा न होना भी उतना ही सच है। ये निर्भर करता है कि जिससे उम्मीद की जा रही है वो उम्मीद के प्रति कितनी रुचि ले पा रहा है। कई बार रुचि न होने के कारण, उम्मीदे पूरी नही हो पाती। इस बात को मुझे समझना चाहिए था लेकिन मैं नासमझ हूं ना! नही समझ पाया। फिर भी मेरी उम्मीद को पूरा करने को लेकर तुम गंभीर हो, और उसके प्रति रुचि भी दिख रही हो, इसके लिए तुम्हारा धन्यवाद। और मेरे इस कथन से तुम्हे जो पीड़ा पहुंची है, उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

Sunday, November 26, 2017

मेरी जान की कलम से....

हर रोज़ एक नया पन्ना जुडता है  जिसमे !!
आप वही मेरे ज़िन्दगी की एक किताब है...

Aao apni laghuta jaane
Apni nirbalta pahchaane
Jaise jag rahta aaya hai usi tarah se rahna hoga!
Saathi, sab kuchh sahna hoga!

Sukun Milta Hai Jab Unse Baat Hoti Hai
Hazar Raaton Mein Wo Ek Raat Hoti Hai
Nigah Uthakar Jab Dekhte Hain Wo Meri Taraf
Mere Liye Wohi Pal Poori Kaaynat Hoti Hai.

Kabhi Hasa Dete Ho,
Kabhi Rula Dete Ho,
Kabhi Kabhi Neend Se Jaga Dete Ho,
Magar Jab Bhi Dil Se Yaad Karte Ho,
Kasam Se Zindagi Ka Ek Pal Badha Dete Ho.

Meri baato me chhal nahi tha...
meri ankho me kal nahi tha....
Unhe dhekh kar ...
mai bhool gai thi apna
bhoot aur bhavishya
Bas mai ji rahi thi...
Apna vartaman ka pal
Bahti nadi ki tarah....
samndar me samarpan....
ki chah liye...

पूनम की कलम से साभार...
(मुझे खुशी है कि अब वो भी लिखने लगी है)
I love you my heart...

Copy and Paste..

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है|
अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए, 
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है| 
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |

जीने  का  अंदाज़  बदलने  वाला  हूँ
अपनी ही फ़ित्रत को छलने वाला हूँ
मेरे दुश्मन भी अब  खुश हो जायेंगे
अपने  सारे  राज़  उगलने  वाला  हूँ
दुनिया है भूगोल बदलने में मशरूफ़
मैं  झूठा  इतिहास  बदलने  वाला  हूँ
अपने अपने हिस्से का सूरज रख लो
बाक़ी  को  मैं  आज  निगलने वाला हूँ
जिसने  मेरी चाहत को ही छीन लिया
अपना वो भगवान  बदलने   वाला  हूँ
दरिया! अपनी गहराई पर फ़ख़्र न कर
मैं  तेरी  लहरों  पर  चलने  वाला हूँ
मेरे  भीतर  कोई  आग  दहकती  है
मैं  उसमें  चुपचाप पिघलने वाला हूँ
धीरे  धीरे   सारे   आँसू   पी   डाले
अब मैं दर्दो ग़म को खलने वाला हूँ
औरों की बैसाखी बन कर खूब चला
अपना जिस्म उठाकर चलने वाला हूँ
पिघला हूँ जिसकी चाहत की शिद्दत से
उसके  ही  साँचे   में   ढलने   वाला  हूँ।।

चिराग कैसे मजबूरियाँ बयाँ करे,
हवा जरूरी भी डर भी उसी से है।

एक मुख़्तसर सी वजह है.....मेरा सबसे झुककर के मिलने की,
मिट्टी की बनी हूँ ना....गुरुर जचता नहीं मुझ पर.....

*खुद को पढ़ता हूँ*
*फिर छोड़ देता हूँ*
*रोज़ ज़िन्दगी का एक*
*पन्ना मोड़ देता हूँ...
                           
बताऊँ तुम्हें खाशियत उदास लोगों की ,
कभी गौर करना ये हँसते बहुत हैं ।।

*उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा
यक़ीं न आए तो इक बात पूछ कर देखो
जो हँस रहा है वो ज़ख़्मों से चूर निकलेगा*

*जमींर हमसे बेचा ना गया,*
*वरना शाम तक अमीर हो जाते..!*

*वाकिफ़ तो हम भी हैं मशहूर होने के तौर तरीकों से,*
*पर ज़िद तो हमें अपने अंदाज से जीने की है।*

कुछ लोग तालियों के तलबगार नहीं होते ;
वो वाह वाह के मोहताज नहीं होते,
जो पैदा हुए हो जमीन ऑसमा एक करने के लिए
वो किसी आधार के मोहताज नहीं होते .
       
ताल्लुकात बढ़ाने हैं तो
कुछ आदतें बुरी भी सीख ले गालिब,
ऐब न हों.
तो लोग महफ़िलों में भी नहीं बुलाते.

*ख्वाहिशें आज भी*
*“खत” लिखती हे मुझे*
*बेखबर इस बात से कि,*
*जिंदगी अब*
*अपने “पते” पर नही रहती...*

आसमा पे ठिकाने
किसी के नही होते,
जो जमीन के नही होते,
वो कही के नही होते।

चेहरे और पोशाक से आंकती है दुनिया..
रूह में उतर कर कब किसी के झांकती है दुनिया।

दौड़ती भागती दुनिया का यही एक फलसफा है.
खूब लुटाते रहे अपनापन, फिर भी लोग खफा है।

मैं इंतिज़ार में हूँ तू कोई सवाल तो कर
यक़ीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूँगा
मुझे यक़ीन कि महफ़िल की रौशनी हूँ मैं
उसे ये ख़ौफ़ कि महफ़िल ख़राब कर दूँगा

सफ़र जारी रखो
आँखों में पानी रखों, होंठो पे चिंगारी रखो!
जिंदा रहना है तो तरकीबे बहुत सारी रखो!!
राह के पत्थर से बढ के, कुछ नहीं हैं मंजिलें!
रास्ते आवाज़ देते हैं, सफ़र जारी रखो

बहुत अंदर तक जला देती है,
वो शिकायतें जो बयाँ नही होती.

रास आ गये हैं कुछ लोगों को हम
कुछ लोगों को ये बात रास नही आई

रस्सी जैसी जिंदगी...तने-तने हालात.....
एक सिरे पे ख़्वाहिशें...दूजे पे औकात....!

काश कोई देखने वाला होता
एक यह ज़िद कि कोई ज़ख्म न देख पाए दिल के मेरे
और एक यह हसरत कि काश कोई देखने वाला होता

उसी की तरहा मुझे सारा ज़माना चाहे ,
वो मेरा होने से ज्यादा मुझे पाना चाहे ?.
मेरी पलकों से फिसल जाता है चेहरा तेरा ,
ये मुसाफिर तो कोई और ठिकाना चाहे .
एक बनफूल था इस शहर में वो भी ना रहा,
कोई अब किस के लिए लौट के आना चाहे .
ज़िन्दगी हसरतों के साज़ पे सहमा-सहमा,
वो तराना है जिसे दिल नहीं गाना चाहे .
हम अपने आप से कुछ इस तरह हुए रुखसत,
साँस को छोड़ दिया जिस तरफ जाना चाहे .

ख़याल से भी खूबसूरत था वो , ख़्वाब से ज्यादा नाजुक
गवां दिया हमने ही उसको , देर तक आज़माने में  ..

हमारी खताओं का हिसाब रखते जाना
उनकी अदाओं का हिसाब मुमकिन नहीं

जो लौट आएं तो कुछ कहना नहीं बस देखना उन्हें गौर से
जिन्हें मंज़िलों पे खबर हुई के ये रास्ता कोई और था

भूलने लगे जो विसाल-ए-यार गुज़रे 
लम्हात-ए-याद मगर यादग़ार गुज़रे
कट गई तमाम शब देखते देखते
रात तेरे ख्वाब .. मददगार गुज़रे
फ़क़त एक इश्क़ से घबरा गए आप
ये हादसे संग मेरे .. कई बार गुज़रे
मिलो तुम हरदम महंगाई की तरह
उम्मीद लिए हम सरे-बाज़ार गुज़रे
ज़रुरतमंद हूँ ये ख़बर क्या फ़ैली
बचकर सरेराह दोस्त-यार गुज़रे
मुफ़्त अच्छी है शायरी ‘अमित’ की
कहते हुए दर से मेरे खरीदार गुज़रे

दायरा हर बार बनाता हूं ज़िदगी के लिए 
लकीरें वहीं रहती है, मैं खिसक जाता हुँ।

तज़ुर्बा दोबारा कर लूं
तज़ुर्बा कहता है मोहब्बत से किनारा कर लूँ
और दिल कहता है ये तज़ुर्बा दोबारा कर लूँ

मैं बादशाह था सबको बताता रहता हूँ
तअल्लुका़त की क़ीमत चुकाता रहता हूँ
मैं उसके झूठ पे भी मुस्कुराता रहता हूँ
मगर ग़रीब की बातों को कौन सुनता है
मैं बादशाह था सबको बताता रहता हूँ
ये और बात कि तनहाइयों में रोता हूँ
मगर मैं बच्चों को अपने हँसाता रहता हूँ
तमाम कोशिशें करता हूँ जीत जाने की
मैं दुशमनों को भी घर पे बुलाता रहता हूँ
ये रोज़-रोज़ की *अहबाब से मुलाक़ातें
मैं आप क़ीमते अपनी गिराता रहता हूँ

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
पहले सेमरस्सिम ना सही फिर भी कभी तो
रस्मो राहे दुनिया ही निभाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे खफा है तो जमाने के लिए आ
कुछ  मेरे पिंडारे मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मानने के लिए आ
एक उमरा से हूँ लज़्जते गिरिया से भी महरूम
आईराहत-ए-जान मुझको रुलाने के लिए आ
ऐब तक दिले खुश-फहम को हैं तुझ से उम्मीदें
यह आख़िरी शमा भी बुझाने के लिए आ
माना की मुहब्बत का छिपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज जताने के लिए आ
जैसे तुझे आते हैं ना आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज ना जाने के लिए आ
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

न मुल्क न शहर ना ये घर अपना
दिल से जाता नहीं है ये डर अपना
बर्फ पे नीले पड़े जिस्म उन नौनिहालो के
सांप भी रो पड़ते जिन्हें देते ज़हर अपना
कैस अब होते तो कहाँ बसर करते
सहरा में बसा है किसी का शहर अपना
रक़ाबत अपने बस का रोग न था
रकीब से कैसे बचाता मैं घर अपना

आज नहीं, तो कल निकलेगा
कोशिश कर, हल निकलेगा
आज नही तो, कल निकलेगा।
अर्जुन के तीर सा निशाना साध,
जमीन से भी जल निकलेगा ।
मेहनत कर, पौधो को पानी दे,
बंजर जमीन से भी फल निकलेगा ।
ताकत जुटा, हिम्मत को आग दे,
फौलाद का भी बल निकलेगा ।
जिन्दा रख, दिल में उम्मीदों को,
समन्दर से भी गंगाजल निकलेगा ।
कोशिशें जारी रख कुछ कर गुजरने की,
जो है आज थमा-थमा सा, वो चल निकलेगा ।

ज़हर देता है मुझे कोई दवा देता है
जो भी मिलता है गम को बढ़ा देता है
क्यूँ सुलगती है मेरे दिल में पुरानी यादें
कौन बुझते हुए शोलों को हवा देता है
हाल हस हस के बुलाता है कभी बाहों में
कभी माज़ी रो रो के सदा देता है

इतना तो किसी ने चाहा भी नहीं होगा
जितना सिर्फ सोचा है मैंने तुम्हें

डाले हुए हैं हम सबने अपने ऐबों पर परदे
और हर शख्स कह रहा है दुनिया खराब है

ख्वाब बोये थे हिज्र काटा है
इस मोहब्बत में बहुत घाटा है।

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